विदिशा। व्यक्ति के जीवन में ज्ञान और चरित्र दोनों का होना आवश्यक है। एक बार यदि ज्ञान नहीं भी है लेकिन वह व्यक्ति तप कर रहा है तो वह अपनी मंजिल को पा सकता है लेकिन ज्ञान कितना भी अधिक हो लेकिन चरित्र नहीं है तो वह अपने लक्ष्य की ओर नहीं पहुंच सकता। उपरोक्त उद्गार आचार्य उदार सागर महाराज ने प्रातःकालीन. प्रवचन सभा में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि अंधे और लंगडे की मित्रता की कहानी आप सभी ने अवश्य पढी होगी जिसमें दो मित्र थे। एक अंधा था और एक लंगडा था । लंगड़ा चल नहीं सकता था और अंधा देख नही सकता था।
दोनों में मित्रता हुई तो अंधे ने लंगडे मित्र को अपने कंधे पर बिठाकर अपनी मंजिल तक पहुंचने का काय शुरू किया। इससे दोनों को सफलता मिल गई। उसी प्रकार यदि चरित्र और ज्ञान दोनों की मित्रता हो जाए तो मंजिल तक पहुंचने में कोई बाधा उत्पन्न नहीं होती। जिसको ज्ञान है और यदि वह उस ज्ञान को आचरण में न उतारे तो ऐसा ज्ञान कोई काम का नहीं होता। जैसे एक विद्यार्थी का पुस्तकीय ज्ञान तब तक कार्यकारी नहीं होता जब तक कि उसका प्रैक्टिकल न किया जाए। उसी प्रकार मोक्षमार्ग में जो स्वाध्याय आपने किया है, उसका प्रयोगात्मक अध्ययन यदि नहीं किया जाए तो वह ज्ञान मात्र पुस्तकीय ज्ञान रह जाता हैं।
आचार्यश्री ने अपने प्रवचन में कहा कि मोक्ष मार्ग में सम्यक दर्शन, ज्ञान और चरित्र तीनों की मित्रता आवश्यक है। अर्थात सबसे पहले हमारा लक्ष्य सही हो। तत्पश्चात उस लक्ष्य के बारे में सही-सही जानकारी हो एवं उस लक्ष्य को पाने के लिये उस पर चलना प्रारंभ कर दिया हो तभी आप उस लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं। जब तक आपको रास्ते की जानकारी नहीं होगी तब तक आप उस रास्ते पर चल नहीं सकते। जब रास्ते की जानकारी हो जाए तो जब तक आप उस पर चलेंगे नहीं तब तक आप उस मंजिल को प्राप्त नहीं कर सकते।
