दूध के नए दाम तय होने में अब महज एक सप्ताह बाकी है। 1 सितंबर को नए दाम तय होंगे, लेकिन इससे पहले ही मालवा के दूध उत्पादक किसानों का आक्रोश सामने आने लगा है। किसानों का कहना है कि दूध की कीमत बढ़ने की चर्चा तो हर बार होती है, लेकिन यह सवाल कोई नहीं पूछता कि गाय-भैंस पालकर दूध पैदा करने वाले किसान के हाथ आखिर कितना पैसा पहुंच रहा है। गांव में 50 से 55 रुपए लीटर खरीदा जाने वाला दूध शहर तक पहुंचते-पहुंचते 65 से 70 रुपए लीटर हो जाता है। किसानों का आरोप है कि इस अंतर का बड़ा हिस्सा उत्पादन करने वाले किसान के बजाय बिचौलियों और डिलीवरी व्यवस्था से जुड़े लोगों की जेब में जा रहा है।
धनखेड़ी के दूध उत्पादक शेरसिंह पवार कहते हैं कि खेती के साथ परिवार का खर्च चलाने के लिए किसान ने पशुपालन को सहारा बनाया था, लेकिन अब यही सहारा घाटे का कारण बनता जा रहा है। उनका कहना है कि पशु खरीदने से लेकर चारा, दाना, मजदूरी और इलाज तक का खर्च किसान उठाता है, लेकिन दूध के अंतिम दाम में उसकी हिस्सेदारी सबसे कमजोर है। 1.50 से 1.75 लाख रुपए की भैंस खरीदने के बाद कुछ ही महीनों तक अपेक्षाकृत अच्छा दूध मिलता है। बाद में उत्पादन घट जाता है, लेकिन पशु की खुराक और देखभाल का खर्च कम नहीं होता। भूसा, हरा चारा, खली-दाना, मजदूरी, पशु चिकित्सा और पशु खरीदने के लिए लगाई गई पूंजी का ब्याज इन सभी को जोड़ें तो दूध उत्पादन की वास्तविक लागत लगातार बढ़ रही है।
एक पशु 4-5 लीटर दूध के लिए रोज का खर्च भारी
एक दुधारू भैंस पर रोजाना करीब 50 से 70 रुपए भूसा, 50 से 75 रुपए हरा चारा, करीब 100 रुपए मजदूरी-खरखाव और 300 से 350 रुपए तक खली-दाने का खर्च आता है। इसके अलावा पशु चिकित्सा, पानी, बिजली और पूंजी पर ब्याज अलग है। ऐसे में दूध का मौजूदा खरीद मूल्य कई किसानों के लिए लागत के मुकाबले बेहद कम साबित हो रहा है।
दूध में गोलमाल
गाय के मामले में भी स्थिति अलग नहीं है। गांव में 35 से 40 रुपए लीटर में खरीदा जाने वाला दूध शहर में 60 से 65 रुपए लीटर तक पहुंच रहा है। यानी ग्राहक ज्यादा कीमत चुका रहा है और किसान फिर भी अपनी लागत को लेकर परेशान है।
डिलीवरी चार्ज क्यों!
किसानों का कहना है कि करीब 20 से 50 या 70 किलोमीटर के दायरे से आने वाले दूध पर परिवहन और वितरण खर्च पारदर्शी होना चाहिए। उनका दावा है कि यह खर्च 2 से 3 रुपए प्रति लीटर के आसपास होना चाहिए, न कि 10 से 20 रुपए। यही अंतर अब किसानों और उपभोक्ता दोनों के लिए सवाल बन गया है।
दाम बढ़े तो किसान को कितना मिलेगा!
सबसे बड़ा सवाल 1 सितंबर को तय होने वाले नए दूध के दाम को लेकर है। यदि लागत बढ़ने के कारण दूध के दाम बढ़ाए जाते हैं तो किसानों की मांग है कि बढ़ी हुई कीमत का लाभ सीधे दूध उत्पादक तक पहुंचे। इसके लिए खरीद मूल्य, परिवहन शुल्क, कमीशन और उपभोक्ता मूल्य की पूरी शृंखला सार्वजनिक करने की मांग भी उठ रही है। किसानों का कहना है कि दूध की कीमत बढ़ाना अकेला समाधान नहीं है। असली समाधान यह है कि ग्राहक से लिए गए हर अतिरिक्त रुपए में किसान की हिस्सेदारी तय हो और बीच की व्यवस्था में होने वाली अनावश्यक कमाई पर रोक लगे।
शकर के भाव 72 रुपए किलो तक पहुंचे कालाबाजारी पर निगरानी के निर्देश
त्योहारी सीजन से पहले शकर के दाम में तेजी ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। शहर के बाजार में शकर के भाव 70 से 72 रुपए किलो तक पहुंच गए हैं। बढ़ती कीमतों के बीच कालाबाजारी और जमाखोरी की आशंका को देखते हुए कलेक्टर ने खाद्य एवं संबंधित विभाग के अधिकारियों को बाजार पर लगातार निगरानी रखने के निर्देश दिए हैं, वहीं राशन की दुकानों से बैठने वाली शकर पर भी विशेष नजर रखी जाएगी।
प्रशासन अब थोक एवं खुदरा बाजार में शकर की आवक, स्टॉक और बिक्री दरों पर नजर रखेगा। खाद्य में आपूर्ति विभाग के अधिकारी को कलेक्टर शिवम वर्मा ने बाजार पर नजर रखने और अपने खुफिया जानकारों को अलर्ट करने के लिए कहा है। विभाग को साफ कहा गया है कि खासकर बड़े व्यापारियों के यहां उपलब्ध स्टॉक की जानकारी जुटाई जाए, ताकि कृत्रिम रूप से कमी पैदा कर कीमतें बढ़ाने वालों पर कार्रवाई की जा सके।
थोक व्यापारियों की जल्द होगी बैठक
शकर की बढ़ती कीमतों को लेकर प्रशासन जल्द ही थोक व्यापारियों की बैठक भी बुलाएगा। बैठक में बाजार में शकर की उपलब्धता, वर्तमान थोक दर, स्टॉक की स्थिति और आगामी दिनों की मांग को लेकर चर्चा की जाएगी। अधिकारियों को यह भी निर्देश दिए गए हैं कि बाजार में अनावश्यक रूप से कीमत बढ़ाने या जमाखोरी की शिकायत मिलने पर तत्काल जांच की जाए, वहीं उचित मूल्य की दुकानों पर गरीबी रेखा के नीचे वाले परिवारों को जो राशन के साथ शकर दी जाती है, उस पर भी निगरानी रखना शुरू कर दिया है। अधिकारियों को नियमित रूप से बाजार की स्थिति की रिपोर्ट लेने और जरूरत पड़ने पर कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।
