• नई दिल्ली: चुनाव के दौरान प्रत्याशियों के आपराधिक रिकॉर्ड का ब्यौरा मीडिया में प्रकाशित करवाने में चुनाव आयोग की विफलता के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने आज आदेश सुरक्षित रख लिया. कोर्ट ने 2018 में आदेश दिया था कि चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड की जानकारी अखबार और टीवी चैनल में प्रसारित की जाए. याचिकाकर्ताओं का कहना था कि पिछले साल हुए बिहार विधानसभा चुनाव में इस आदेश का पालन नहीं हुआ था. ऐसे में चुनाव आयोग के अधिकारियों और राजनीतिक पार्टियों के नेताओं पर कोर्ट की अवमानना के लिए कार्रवाई होनी चाहिए.

चुनाव आयोग के लिए पेश हुए वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने आज कोर्ट को बताया कि 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल ने 103, बीजेपी ने 77, जेडीयू ने 56, एनसीपी ने 26 और सीपीआई (एम) ने 4 आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोगों को टिकट दिया. पार्टियों को कोर्ट के फैसले के बारे में जानकारी दी गई थी. लेकिन ज़्यादातर मामलों में उसका पालन नहीं हुआ. संविधान के अनुच्छेद 324 में चुनाव के आयोजन का अधिकार आयोग के पास है, लेकिन अपने निर्देशों का पालन न करने वाली पार्टियों पर कार्रवाई की बहुत ज़्यादा शक्ति नहीं है.

चुनाव आयोग की तरफ से ही पेश वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने कहा कि कोर्ट के आदेश का पालन न करने वाले राजनीतिक दलों पर अवमानना की कार्रवाई होनी चाहिए. साल्वे ने वकील प्रशांत भूषण को एक मामले में मिली सज़ा का हवाला देते हुए कहा, “पार्टियों के नेताओं पर 1 रुपए का दंड जैसी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए. इससे नेता मुस्कुराते हुए तस्वीर खिंचवाकर पैसा जमा करने आएंगे.” मामले में एमिकस क्यूरी बनाए गए वरिष्ठ वकील के वी विश्वनाथन ने कहा कि चुनाव आयोग पार्टियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए शक्तिहीन नहीं है. इलेक्शन सिंबल आर्डर 1968 की धारा 16A के तहत चुनाव आयोग को अधिकार है कि वह किसी पार्टी का चुनाव चिन्ह निलंबित कर दे.

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