ग्वालियर . मैंने अपने गुरु पूज्य रत्नाकर विमल सागर जी महाराज जैसा वात्सल्य और प्रेम किसी दिगंबर जैन संत में नहीं देखा, जो मुझे उनमें से प्राप्त हुआ. मैं उन्हीं की कोख से जन्मा हुआ छोटा सा पुष्प हूं. मैं उन्हें कुछ भी नहीं दे सका, उन्होंने मुझे बहुत कुछ दिया. वह तो मेरे लिए वात्सल्य की मूर्ति हैं.
यह विचार गणाचार्य पुष्पदंत सागर महाराज ने शनिवार को वात्सल्य रत्न आचार्य विमल सागर महाराज की दीक्षा दिवस पर नई सड़क स्थित चंपाबाग धर्म शाला में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए. उन्होंने कहा कि गुरुदेव महा तपस्वी शास्त्रों के ज्ञाता और निर्मित ज्ञानी थे. वे हमेशा तप, त्याग और ध्यान मैं लीन रहकर विश्व शांति मंत्र के जाप करते थे. भक्त जनों के प्रति उनका वात्सल्य हमेशा बना रहता था. लोगों की उनके प्रति अगाथ आस्था, श्रद्धा और भक्ति थी.
गणचार्य ससंघ के चरणों में सकल जैन समाज की ओर डॉ. वीरेंद्र गंगवाल, प्रशांत गंगवाल, प्रियांक जैन, अजीत कासलीवाल, राजेश पाटौदी, मंयक पंड्या, अनिल पाटौदी, विनय कासलीवाल ने श्रीफल भेंटकर आशीर्वाद लिया. संचालन ममता पाटौदी व मिट्ठू सेठी ने किया.
