उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में फर्जी आईएएस अधिकारी बनकर नौकरी के नाम पर ठगी करने का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। सीआईडी लखनऊ और चिनहट पुलिस की संयुक्त टीम ने गुरुवार को एक ऐसे शातिर ठग को गिरफ्तार किया है, जो खुद को गुजरात कैडर का आईएएस अधिकारी बताकर सैकड़ों लोगों को चूना लगा चुका था। आरोपी की पहचान डॉ. विवेक मिश्रा उर्फ विवेक आनंद मिश्रा के रूप में हुई है, जिसने 150 से अधिक लोगों से लगभग 80 करोड़ रुपये ठग लिए थे। यह गिरफ्तारी कमता बस स्टेशन के पास हुई, जहां आरोपी छिपा हुआ था। 35 वर्षीय विवेक मिश्रा मूल रूप से झारखंड के बोकारो का निवासी है और उसने बेरहामपुर से बीटेक की डिग्री हासिल की है। वह खुद को 2014 बैच का आईएएस अधिकारी बताता था, जो गुजरात सरकार में प्रधान सचिव के पद पर तैनात है। इतना ही नहीं, वह दावा करता था कि उसकी बहनें निधि और विधि मिश्रा गुजरात कैडर की आईपीएस अधिकारी हैं। आरोपी ने सोशल मीडिया और व्हाट्सएप ग्रुप्स पर फर्जी प्रोफाइल बनाकर अपनी विश्वसनीयता बढ़ाई और असली आईएएस/आईपीएस अधिकारियों के नामों का इस्तेमाल किया।विवेक मिश्रा का ठगी का तरीका बेहद शातिराना था। वह लोगों को आईएएस, आईपीएस, डिप्टी एसपी (स्पोर्ट्स कोटा), पब्लिक रिलेशंस ऑफिसर (पीआरओ) और गुजरात होम मिनिस्ट्री में अन्य पदों पर नौकरी दिलाने का वादा करता था। इसके लिए वह फर्जी सरकारी सील और लेटरहेड वाले अपॉइंटमेंट लेटर जारी करता था। कई मामलों में, वह युवतियों से शादी का वादा करके उनके परिवारों से संपर्क करता और फिर नौकरी के बहाने पैसे ऐंठता। प्रत्येक उम्मीदवार से वह 2 लाख से 5 लाख रुपये तक वसूलता था। इस तरह उसने कई राज्यों में अपना नेटवर्क फैलाया और कुल 80 करोड़ रुपये की ठगी की।

सुप्रीम कोर्ट वकील भी बने शिकार

इस घोटाले के शिकार 150 से अधिक लोग हुए, जो विभिन्न राज्यों से थे। एक प्रमुख पीड़ित सुप्रीम कोर्ट के वकील डॉ. आशुतोष मिश्रा हैं, जो लखनऊ के विकल्प खंड के निवासी हैं। आशुतोष ने जून 2018 में रिश्तेदारों के माध्यम से विवेक से मुलाकात की थी। आरोपी ने उन्हें डिप्टी सुपरिंटेंडेंट के पद पर फर्जी अपॉइंटमेंट लेटर दिया और 4.5 लाख रुपये ठग लिए। जब लेटर फर्जी निकला, तो आशुतोष ने 2019 में चिनहट थाने में एफआईआर दर्ज कराई। इस शिकायत के आधार पर मामला शुरू हुआ, जो बाद में इकोनॉमिक ऑफेंस विंग (ईओडब्ल्यू) और फिर सीआईडी को ट्रांसफर कर दिया गया। पीड़ितों में ज्यादातर वे लोग थे जो सरकारी नौकरी की तलाश में थे। विवेक मिश्रा ने उन्हें विश्वास दिलाने के लिए फर्जी दस्तावेज और प्रोफाइल दिखाए, जिससे कई परिवारों की मेहनत की कमाई लुट गई।

पुलिस की 6 साल की तलाश का अंत

यह मामला 2019 से लंबित था, जब से एफआईआर दर्ज हुई थी। सीआईडी के डीजी बिनोद सिंह के निर्देश पर डीआईजी सीआईडी अशोक शुक्ला ने जांच की निगरानी की। आरोपी 6 साल से फरार था और कई पहचानों का इस्तेमाल कर रहा था, जिसमें वह खुद को गवर्नर हाउस में डेपुटेड बताता था। गुरुवार को सीआईडी और चिनहट पुलिस की टीम ने उसे कमता बस स्टेशन के पास से गिरफ्तार किया।

गिरफ्तारी के बाद पुलिस आरोपी के बैंक खातों और डिजिटल रिकॉर्ड की जांच कर रही है। जांच से पता चला है कि विवेक का ठगी का नेटवर्क अंतरराज्यीय था, और पुलिस अन्य राज्यों से भी पीड़ितों की जानकारी जुटा रही है। फिलहाल, आरोपी से पूछताछ जारी है, और पुलिस को उम्मीद है कि इससे और भी खुलासे होंगे।

लालच और शॉर्टकट से बचें
यह घटना एक बार फिर याद दिलाती है कि सरकारी नौकरियों के लिए कोई शॉर्टकट नहीं होता। पुलिस अधिकारियों ने लोगों से अपील की है कि वे ऐसे वादों पर भरोसा न करें और किसी भी संदिग्ध मामले की रिपोर्ट करें। इस तरह के घोटाले अक्सर सोशल मीडिया के माध्यम से फैलते हैं, इसलिए सतर्क रहना जरूरी है