नई दिल्ली: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर भारत में भी देखने को मिल रहा है, जहां एलपीजी सिलेंडर की कीमतों को लेकर लोगों में चिंता बढ़ गई है। सवाल यह है कि क्या 1 अप्रैल से आम आदमी पर महंगाई का एक और बोझ पड़ने वाला है?

सरकार ने अफवाहों पर लगाया विराम

देशभर में संभावित लॉकडाउन और ईंधन संकट की अफवाहों के बीच केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री Hardeep Singh Puri ने स्पष्ट किया है कि ऐसी सभी खबरें पूरी तरह निराधार हैं। उन्होंने कहा कि सरकार किसी भी तरह के लॉकडाउन पर विचार नहीं कर रही है और नागरिकों को घबराने की आवश्यकता नहीं है।

ईंधन आपूर्ति को लेकर स्थिति मजबूत

सरकार के अनुसार, भारत के पास तेल और गैस का पर्याप्त भंडार मौजूद है और आने वाले करीब 60 दिनों की जरूरतों को पहले ही सुरक्षित कर लिया गया है। इसके साथ ही भारत अब 40 से अधिक देशों से कच्चा तेल आयात कर रहा है, जिससे किसी एक क्षेत्र में संकट का असर सीमित हो जाता है।

तेल कंपनियां भी सतर्क

तेल विपणन कंपनियों ने भी हालात को देखते हुए अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। पेट्रोल पंप संचालकों को अतिरिक्त क्रेडिट सुविधा दी जा रही है ताकि आपूर्ति में कोई बाधा न आए। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि भारत पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यातक है, इसलिए ‘राष्ट्रीय ऊर्जा आपातकाल’ जैसी कोई स्थिति फिलहाल नहीं है।

फिर भी क्यों बढ़ रही है चिंता?

हालांकि, वैश्विक बाजार में कच्चे तेल और गैस की कीमतों में लगातार उछाल बना हुआ है। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के चलते अंतरराष्ट्रीय कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं, जिसका सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ सकता है।

1 अप्रैल को हो सकता है फैसला

हर महीने की पहली तारीख को तेल कंपनियां LPG, CNG और PNG की कीमतों की समीक्षा करती हैं। ऐसे में 1 अप्रैल, 2026 को कीमतों में बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

मार्च में पहले ही लग चुका है झटका

मार्च 2026 में घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में करीब 60 रुपये की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी, जिसके बाद इसकी कीमत लगभग 853 रुपये तक पहुंच गई। वहीं, कमर्शियल सिलेंडर की कीमत भी दिल्ली में 1768.50 रुपये तक जा चुकी है।

क्या मिलेगी राहत या बढ़ेगा बोझ?

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो एलपीजी उपभोक्ताओं को एक बार फिर महंगाई का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, अंतिम फैसला वैश्विक ऊर्जा बाजार की स्थिति पर ही निर्भर करेगा।