भोपाल ! राजगढ़ जिले का ग्राम पंचायत गादिया की 15 वर्षीय संगीता सागर 11वीं की छात्रा है। वह बताती है, कि 10वीं में उसके साथ 30 लड़कियां परीक्षा में बैठी थीं, जिनमें से केवल वह उतीर्ण हो पायी। 10वीं में पढ़ाई के दौरान ही दादाजी ने नातरा प्रथा के अंतर्गत उसकी शादी तय कर दी थी, जिसका विरोध करते हुए उसने शिकायत महिला सशक्तीकरण विभाग के अधिकारियों से कर दी।

मध्यप्रदेश सरकार उस वक्त बाल विवाह को सामाजिक भागीदारी से रोकने के लिए सघन अभियान चला रही थी। टेलीविजन पर वृत्तचित्र, आखबारों में विज्ञापन, नुक्कड़ नाटकों और दीवार लेखन आदि पर बाल विवाह रोकने के संदेश लिखे जा रहे थे, जिनके जरिये संगीता को शादी की सही उम्र का पता चला और उसने अपनी शादी रोकवाने की गुजारिश सरकार से की। अधिकारियों ने उसके घर पहुॅचकर उसके दादाजी को विवाह संबंधी कानून की समझाइश दी और वे मान भी गये।
लेकिन संगीता की परेशानी यहीं खत्म नहीं हुई, बल्कि और बढ़ गई। करीब एक साल बाद नातरा प्रथा तोडऩे से नाराज होकर संगीता के होने वाले ससुर अब झगड़ा प्रथा के तहत 3 लाख रुपये की मांग कर रहे हैं। डरी-सहमी संगीता कहती है, कि परिवार के पास इतने रुपये है ही नहीं, तो कहां से देंगे।
उसके पिता शरीर से लाचार है। दादाजी की मृत्यु हो चुकी है। मात्र 12 बीघा जमीन है, जिस पर एक ही फसल होती है। चारों ओर पहाड़ी इलाका है, जहां उसकी मां दूसरों की मवेशी चराती है। आस-पास रोजगार के कोई साधन नहीं है। महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना के तहत जॉब कार्ड बना है, परंतु काम नहीं मिलता।
लेकिन इन तमाम परेशानियों के बावजूद उसने इसकी शिकायत महिला सशक्तीकरण विभाग से नहीं की है। क्योंकि परंपरा के अनुसार इस समुदाय में नातरा प्रथा तोडऩे पर झगड़ा प्रथा लागू हो जाती है और ससुराल वाले अपनी प्रतिष्ठा धूमिल होने का आरोप मढ़कर पैसे मांगते हैं।
संगीता 5 भाई बहनों में सबसे बड़ी है। उसके बाद पूजा की उम्र 14, ऊषा 11, पिंकी 5 और एक मात्र भाई राजा है। गांव के सरपंच चैन सिंह बताते हैं, कि इसमें किसी सरकारी अधिकारी का दखल नहीं होता, बल्कि पंचों के जरिये सुलह-समझौता करवाई जाती है। समझौतों के मुताबिक 3 लाख न सही, पर कुछ न कुछ तो देना पड़ेगा। वर्ना मामला तूल पकड़ेगा और गांव वालों को नुकसान भुगतना पड़ेगा। उनकी फसलों में आग लगा दी जायेगी, उन पर हमला भी किया जा सकता है। यह उनकी प्रतिष्ठा का प्रश्र बन जाता है, इसलिए यह मामला लेन-देन से ही सुलझता है।
गांव के बुजुर्ग 70 वर्षीय अमर सिंह कहते हैं, कि उसने अब तक 15 से अधिक झगड़ा प्रथा के मामले देखे हैं। इसमें समझौते के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है। समुदाय का कोई व्यक्ति प्रशासन के पास शिकायत लेकर नहीं जाता। गरीबी, अशिक्षा और असुरक्षा वाले इस गांव में दो साल पहले मुख्यमंत्री आवास के तहत 15 और इंदिरा आवास के तहत 22 पक्के घर बने हैं। पंचपरमेश्वर योजना के अंतर्गत सीसी रोड बन गई है। खाद्य विभाग ने अंतोदय योजना के तहत सबके राशन कार्ड भी बना दिये हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात है, कि यहां की सारी स्ट्रीट लाइट सौर ऊर्जा से जलती हैं। पंचायत के सचिव सचिन सागर बताते हैं, कि 10 फीसदी घरों में ही शौचालय है, जबकि लक्ष्य 150 शौचालय का टारगेट है। 7 हैण्डपम्पों से जरिये लोगों को पेयजल उपलब्ध हो रहा है। गांव के कुछ बच्चे भोपाल में इंजीनियरिंग पढ़ रहे हैं। कुछ की तो पुलिस में नौकरी भी लग चुकी है। अगर कुछ नहीं बदला है तो परंपरा के नाम पर नाबालिग लड़कियों को नातरा प्रथा में बेचना। बहरहाल, सारी जद्दोजहद के बात भी संगीता अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती है और पुलिस अधिकारी बनना चाहती है। राजगढ़ के खिलचीपुर, राजगढ़ तथा नरसिंहगढ़ विकास खण्ड इस कुप्रथा से अधिक प्रभावित है। इसके अलावा ब्यावरा एवं सारंगपुर आंशिक रूप से प्रभावित है। लगभग 15 समुदाय इन दोनों कुप्रथाओं से ग्रसित है।

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