बासु चटर्जी भारतीय सिनेमा का वह चमकता सितारा थे, जिन्होंने चमचमाती और भव्य दुनिया के बजाय आम आदमी के जीवन की सहजता को रुपहले पर्दे पर उतारा। 4 जून को उनकी पुण्यतिथि पर, पूरा देश और सिनेमा जगत उस महान दूरदर्शी फिल्मकार की सिनेमाई यात्रा को याद करता है, जिसने मध्यम वर्ग के रोजमर्रा के संघर्षों और खुशियों को एक खूबसूरत दास्तान में बदल दिया। जब 1970 और 80 के दशक में हिंदी सिनेमा पर ‘एंग्री यंग मैन’ का जादू सिर चढ़कर बोल रहा था और स्क्रीन पर केवल मारधाड़, बदला और भव्य मेलोड्रामा का बोलबाला था, तब बासु दा (जैसा कि उन्हें प्यार से बुलाया जाता था) ने एक बिल्कुल अलग और समानांतर राह चुनी। उन्होंने दर्शकों को एक ऐसा ‘हीरो’ दिया, जो कोई महामानव नहीं था, बल्कि वह बस हमारे और आपके जैसा, पड़ोस की गली में रहने वाला एक साधारण इंसान था।

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️अजमेर से मुंबई: एक कार्टूनिस्ट का सिनेमाई सफर
बासु चटर्जी का जन्म 10 जनवरी 1927 को राजस्थान के अजमेर में एक बंगाली परिवार में हुआ था। उनकी परवरिश और जीवन के शुरुआती अनुभवों ने उनकी सोच को बहुत गहराई से आकार दिया। मुंबई (तब बॉम्बे) आने के बाद, उन्होंने तुरंत फिल्मों का रुख नहीं किया। 1950 के दशक में उन्होंने आरके करंजिया के प्रसिद्ध साप्ताहिक टैब्लॉइड अखबार ‘ब्लिट्ज़’ में एक इलस्ट्रेटर और कार्टूनिस्ट के रूप में अपना करियर शुरू किया। करीब 18 वर्षों तक एक कार्टूनिस्ट के रूप में काम करते हुए उन्होंने समाज को बहुत बारीकी से देखा। एक कार्टूनिस्ट के पास किसी भी स्थिति के अंतर्निहित व्यंग्य, मानवीय कमजोरियों और सादगी को पकड़ने की एक अद्भुत दृष्टि होती है। यही दृष्टि बाद में उनकी फिल्मों की यूएसपी बनी।
बासु दा ने अपने निजी जीवन को हमेशा बहुत सादा और चकाचौंध से दूर रखा। उनके परिवार में उनकी पत्नी और दो बेटियां—रुपाली गुहा और सोनाली शामिल हैं। उनकी बेटी रुपाली गुहा ने भी अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए फिल्म निर्देशन को अपने करियर के रूप में चुना।

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️सिनेमाई यात्रा: चर्चित फिल्में और यादगार किरदार
बासु चटर्जी ने अपने फिल्मी सफर की शुरुआत फिल्म ‘तीसरी कसम’ (1966) में निर्देशक बासु भट्टाचार्य के सहायक के रूप में की थी। इसके बाद, साल 1969 में उन्होंने ‘सारा आकाश’ फिल्म से अपने स्वतंत्र निर्देशन की शुरुआत की, जो प्रसिद्ध लेखक राजेंद्र यादव के उपन्यास पर आधारित थी। इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा में ‘मिडिल-ऑफ-द-रोड’ (समानांतर सिनेमा) की मजबूत नींव रखी। इसके बाद बासु दा ने एक के बाद एक कई मील के पत्थर स्थापित किए:
●पिया का घर (1972): जया भादुड़ी और अनिल धवन अभिनीत यह फिल्म मुंबई की एक तंग चॉल के छोटे से कमरे में रहने वाले एक नवविवाहित जोड़े के प्यार और तालमेल की बेहद मार्मिक और हल्की-फुल्की कहानी बयां करती है।
●रजनीगंधा (1974): अमोल पालेकर और विद्या सिन्हा के शानदार अभिनय से सजी इस फिल्म ने प्रेम की त्रिकोणीय जटिलताओं और एक महिला के मन के अंतर्द्वंद्व को बिना किसी ड्रामे के बेहद परिपक्वता से दिखाया।
●छोटी सी बात (1976): अमोल पालेकर (अरुण) और विद्या सिन्हा (प्रभा) अभिनीत यह एक ऐसे शर्मीले प्रेमी की कहानी है जो अपनी सहकर्मी से प्यार का इजहार नहीं कर पाता। अशोक कुमार ने इसमें ‘कर्नल जूलियस सिंह’ के रूप में जो गाइड की भूमिका निभाई, वह आज भी कल्ट मानी जाती है।
●चितचोर (1976): अमोल पालेकर और जरीना वहाब की इस फिल्म ने ग्रामीण और अर्ध-शहरी परिवेश के भोलेपन और गलतफहमियों से उपजे प्यार को सुरीले गीतों के साथ पिरोया।
●खट्टा मीठा (1978) और बातों बातों में (1979): जहां ‘खट्टा मीठा’ पारसी परिवार की पृष्ठभूमि पर बनी एक बेहतरीन पारिवारिक कॉमेडी थी, वहीं ‘बातों बातों में’ मुंबई की लोकल ट्रेनों में सफर के दौरान पनपने वाले रोमांस और ईसाई परिवार के ताने-बाने को खूबसूरती से दर्शाती है।
●एक रुका हुआ फैसला (1986): यह फिल्म बासु दा की विविधता का सबसे बड़ा प्रमाण है। हॉलीवुड की ’12 एंग्री मेन’ पर आधारित इस कोर्ट-रूम ड्रामा में उन्होंने बंद कमरे के भीतर मानव मनोविज्ञान और पूर्वाग्रहों की ऐसी परतें खोलीं कि दर्शक दंग रह गए। इसके अलावा उन्होंने ‘स्वामी’ (1977), ‘शौकीन’ (1982) और ‘चमेली की शादी’ (1986) जैसी बेहद लोकप्रिय फिल्मों का निर्देशन भी किया।
बासु चटर्जी के समकालीन निर्देशकों में श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी और मृणाल सेन जैसे दिग्गज शामिल थे, जो समानांतर सिनेमा के ही अगुआ थे। लेकिन बासु दा उनसे काफी अलग थे। जहां उनके समकालीनों की फिल्में गंभीर सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों, ग्रामीण शोषण, आक्रोश और गहरे अवसाद से जुड़ी होती थीं, वहीं बासु चटर्जी की फिल्मों में एक अदभुत ‘पॉजिटिविटी’ और ‘सौम्य हास्य’ यानी जेन्ट्ल सटायर होता था। वे समाज की बुराइयों को दिखाते समय क्रूर नहीं होते थे, बल्कि एक मुस्कुराते हुए चेहरे के साथ आईना दिखाते थे। उनकी फिल्मों का कैनवास भारी-भरकम नहीं, बल्कि हल्का-फुल्का और गुदगुदाने वाला होता था, जिसे पूरा परिवार एक साथ बैठकर देख सकता था।
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️नायक हमेशा ‘निम्न मध्यवर्गीय’ ही चुना :
बासु चटर्जी की फिल्मों का नायक हमेशा एक क्लर्क, एक साधारण नौकरीपेशा युवक या मध्यम वर्ग का आम नागरिक ही क्यों होता था? इसका सीधा जवाब उनकी जीवन दृष्टि में छुपा है। बासु दा का मानना था कि असली भारत और उसकी सच्ची कहानियां इसी वर्ग में बसती हैं। साधारण में असाधारण तलाशना: उच्च वर्ग की लक्ज़री या अंडरवर्ल्ड के अपराधों में जो ड्रामा होता है, वह कृत्रिम है। असली रोमांच और संघर्ष तो सुबह लोकल ट्रेन पकड़ने, ऑफिस में बॉस की डांट सुनने, घर के छोटे से बजट में खुशियां तलाशने और बिना किसी को नुकसान पहुंचाए चुपचाप अपने प्यार को पाने की जद्दोजहद में है।
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️जमीन से जुड़े मुद्दे:
चॉल में प्राइवेसी न मिलना, मकान मालिक और किराएदार का झगड़ा, बस स्टॉप पर किसी का इंतजार करना—ये ऐसी समस्याएं थीं जिससे भारत का एक बहुत बड़ा वर्ग सीधे जुड़ सकता था। बासु दा के नायक (जैसे अमोल पालेकर) के पास न तो सिक्स-पैक एब्स थे और न ही वे हवा में गाड़ियां उड़ा सकते थे। वे अपनी झिझक, डर और सादगी के कारण ही सीधे दर्शकों के दिलों में उतर जाते थे।
हिंदी और बांग्ला सिनेमा को योगदान तथा टेलीविजन क्रांति
बासु चटर्जी केवल हिंदी तक सीमित नहीं रहे, उन्होंने भाषाई सीमाओं को लांघकर बंगाली सिनेमा को भी समृद्ध किया। उन्होंने भारत और बांग्लादेश के कलाकारों को एक साथ लाकर ‘होठात ब्रिष्टि’ (1998) जैसी सुपरहिट बंगाली फिल्म बनाई। इसके अलावा ‘चुपी चुपी’ (2001) और ‘ताक झाल मिष्टी’ (2002) जैसी फिल्मों के जरिए उन्होंने बंगाली दर्शकों को भी अपनी अनूठी कहानी कहने की कला से मंत्रमुग्ध किया।
फिल्मों के साथ-साथ बासु दा दूरदर्शन के स्वर्ण युग के भी प्रणेता थे। जब वे टीवी की दुनिया में आए, तो उन्होंने दो ऐसे शो दिए जो भारतीय टेलीविजन इतिहास के मील के पत्थर बन गए। पहला था ‘रजनी’ (1985), जिसमें प्रिया तेंदुलकर ने एक जागरूक और साहसी महिला का किरदार निभाकर उपभोक्ता अधिकारों और सामाजिक विसंगतियों के खिलाफ आवाज उठाई और हर घर की रोल मॉडल बन गईं। दूसरा था ‘व्योमकेश बक्शी’ (1993), जिसमें रजित कपूर ने भारत के ‘शर्लक होम्स’ के रूप में अपनी अमिट छाप छोड़ी।
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️सिनेमा और समाज में अद्वितीय योगदान के लिए मिले कई प्रतिष्ठित सम्मान :
●राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार: साल 1992 में उन्हें फिल्म ‘दुर्गा’ के लिए ‘पारिवारिक कल्याण पर सर्वश्रेष्ठ फिल्म’ का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।
●फिल्मफेयर पुरस्कार: उन्हें कई बार फिल्मफेयर से सम्मानित किया गया। ‘सारा आकाश’ (1972) और ‘कमला की मौत’ (1991) के लिए सर्वश्रेष्ठ पटकथा का पुरस्कार मिला। वहीं, फिल्म ‘स्वामी’ (1977) के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के फिल्मफेयर पुरस्कार से नवाजा गया। ‘रजनीगंधा’ (1975) और ‘जीना यहां’ (1980) को ‘सर्वश्रेष्ठ फिल्म (क्रिटिक्स)’ का पुरस्कार मिला।
●लाइफटाइम अचीवमेंट: साल 2007 में उन्हें सिनेमा में जीवनभर के योगदान के लिए ‘IIFA लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड’ से सम्मानित किया गया।
4 जून 2020 को 93 वर्ष की आयु में बासु चटर्जी ने दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन वे हमारे बीच अपनी उन कालजयी फिल्मों के जरिए हमेशा जिंदा रहेंगे, जो जिंदगी को जीना सिखाती हैं। उनकी फिल्में हमें याद दिलाती हैं कि खुश रहने के लिए किसी महल की जरूरत नहीं होती, बल्कि छोटे से घर में अपनों का साथ और चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान ही काफी है। बासु दा का सिनेमा हमेशा भारतीय मध्यम वर्ग का सबसे सच्चा और खूबसूरत आईना बना रहेगा।
■रामानंद सोनी
