हिंदी फिल्म संगीत के स्वर्णिम युग में अनेक महान गायिकाओं ने अपनी प्रतिभा की अमिट छाप छोड़ी, किंतु कुछ स्वर ऐसे भी रहे जो असाधारण होने के बावजूद अपेक्षाकृत कम चर्चा में रहे। सुमन कल्याणपुर ऐसा ही एक नाम हैं, जिनकी मधुर, कोमल और भावपूर्ण गायकी ने भारतीय फिल्म संगीत को अनेक कालजयी गीत दिए। उनकी आवाज़ में शास्त्रीय संगीत की गहराई, भावों की सहज अभिव्यक्ति और शब्दों की स्पष्टता का अद्भुत संगम था।

सुमन कल्याणपुर का जन्म 28 जनवरी 1937 को तत्कालीन बंगाल प्रेसीडेंसी के ढाका में हुआ था, जो आज बांग्लादेश की राजधानी है। विभाजन के बाद उनका परिवार भारत आ गया। बचपन से ही संगीत के प्रति आकर्षण रखने वाली सुमन ने शास्त्रीय संगीत का प्रशिक्षण प्राप्त किया और शीघ्र ही पार्श्वगायन की दुनिया में प्रवेश कर लिया। 1950 के दशक के उत्तरार्ध में उन्होंने हिंदी फिल्मों में गाना शुरू किया और धीरे-धीरे अपनी अलग पहचान बना ली।

सुमन कल्याणपुर ने हिंदी के अलावा मराठी, गुजराती, बंगाली, भोजपुरी, पंजाबी, उड़िया और अन्य भारतीय भाषाओं में भी हजारों गीत गाए। हिंदी फिल्मों में उनके गाए अनेक गीत आज भी श्रोताओं की स्मृतियों में ताजे हैं। “ना तुम हमें जानो” (बात एक रात की), “अजब है दास्तां तेरी ऐ जिंदगी” (शराबी), “तुमने पुकारा और हम चले आए” (राजकुमार), “दिल एक मंदिर है” (दिल एक मंदिर), “मेरे महबूब न जा” (नूर महल), “बहना ने भाई की कलाई पर प्यार बाँधा है” (रेशम की डोरी) और “आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे” (ब्रह्मचारी) जैसे गीत उनकी लोकप्रियता के शिखर के प्रमाण हैं। उन्होंने मोहम्मद रफ़ी के साथ अनेक यादगार युगल गीत गाए, जो आज भी रेडियो और संगीत मंचों पर समान रूप से लोकप्रिय हैं।

हिंदी फिल्म उद्योग में सुमन कल्याणपुर का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। जिस दौर में लता मंगेशकर का लगभग एकछत्र प्रभुत्व था, उस समय सुमन ने अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी आवाज़ की मधुरता इतनी प्रभावशाली थी कि कई बार श्रोता उनके गीतों को लता मंगेशकर का गीत समझ बैठते थे। यही कारण है कि संगीत प्रेमियों के बीच दोनों गायिकाओं की तुलना लंबे समय तक होती रही।

सुमन कल्याणपुर और लता मंगेशकर के बीच कथित व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता की चर्चा भी वर्षों तक होती रही। विशेष रूप से उस समय जब रॉयल्टी के मुद्दे पर लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी के बीच मतभेद हुए, तब कई संगीतकारों ने रफ़ी के साथ युगल गीतों के लिए सुमन कल्याणपुर को अवसर दिया। इससे उनकी लोकप्रियता और बढ़ी। हालांकि दोनों गायिकाओं ने सार्वजनिक रूप से कभी किसी व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा को स्वीकार नहीं किया और यह विषय अधिकतर मीडिया और संगीत जगत की चर्चाओं तक ही सीमित रहा।

व्यक्तिगत जीवन में सुमन कल्याणपुर ने सादगी और गरिमा को हमेशा प्राथमिकता दी। उनका विवाह मुंबई के उद्योगपति रमेश कल्याणपुर से हुआ था। उनकी एक पुत्री, चारु कल्याणपुर, हैं। परिवार और संगीत साधना के बीच संतुलन बनाते हुए उन्होंने अपेक्षाकृत शांत और निजी जीवन व्यतीत किया।

भारतीय संगीत जगत में उनके योगदान को अनेक सम्मानों से मान्यता मिली। वर्ष 2023 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया, जो भारतीय संगीत के क्षेत्र में उनकी दीर्घकालीन सेवाओं का राष्ट्रीय सम्मान था।

31 मई 2026 को 89 वर्ष की आयु में सुमन कल्याणपुर का मुंबई में निधन हो गया। उनके निधन के साथ हिंदी फिल्म संगीत के स्वर्णिम युग की एक और सुमधुर आवाज़ सदा के लिए मौन हो गई। किंतु उनके गीत आज भी जीवित हैं और आने वाली पीढ़ियों को भारतीय फिल्म संगीत की श्रेष्ठ परंपरा से परिचित कराते रहेंगे। अपनी विशिष्ट शैली, मधुर कंठ और विनम्र व्यक्तित्व के कारण सुमन कल्याणपुर भारतीय संगीत इतिहास में सदैव सम्मानपूर्वक स्मरण की जाती रहेंगी।

■रामानंद सोनी