भारतीय रंगमंच और सिनेमा के इतिहास में जब भी किसी ऐसे अभिनेता का नाम लिया जाएगा जिसने अपनी विदेशी पहचान से परे जाकर खुद को पूरी तरह हिंदुस्तानी संस्कृति, उर्दू तहज़ीब और अभिनय की दुनिया में विलीन कर दिया, तो जेहन में एक ही नाम उभरेगा—टॉम ऑल्टर। नीली आँखें, सुनहरे बाल, गोरी रंगत और जब वे मुँह खोलते, तो शुद्ध हिंदी और बेहद नफीस उर्दू की ऐसी गंगा-जमुनी धारा बहती कि सुनने वाले मंत्रमुग्ध रह जाते। 22 जून को उनके जन्मदिन पर, आइए रुख करते हैं इस महान कलाकार के जीवन, उनकी कला और उनकी बेमिसाल विरासत की ओर।

*​जन्म, परिवार और जड़ों की तलाश*

​थॉमस बीच ऑल्टर का जन्म 22 जून 1950 को देवभूमि उत्तराखंड के खूबसूरत हिल स्टेशन मसूरी में हुआ था। मूल रूप से उनका परिवार अमेरिकी था। उनके दादा-दादी वर्ष 1916 में अमेरिका के ओहियो से भारत आए थे और यहीं बस गए। टॉम के पिता का जन्म सियालकोट (अब पाकिस्तान) में हुआ था। विभाजन के बाद यह परिवार भारत आ गया और मसूरी को अपना आशियाना बनाया।

​टॉम ऑल्टर का पालन-पोषण पूरी तरह से भारतीय परिवेश में हुआ। उन्होंने मसूरी के वुडस्टॉक स्कूल से शिक्षा प्राप्त की और फिर आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका की येल यूनिवर्सिटी भी गए। लेकिन उनका दिल हमेशा भारत के लिए धड़कता था, इसलिए वे जल्द ही वापस लौट आए। अभिनय की दुनिया में कदम रखने से पहले उन्होंने हरियाणा के जगाधरी में एक स्कूल में शिक्षक के रूप में भी काम किया। टॉम ने 1977 में कैरल इवांस से शादी की। उनके दो बच्चे हैं—एक बेटा जेमी ऑल्टर (जो एक प्रसिद्ध खेल पत्रकार और अभिनेता हैं) और एक बेटी अफ़शां।

*​राजेश खन्ना की प्रेरणा और फिल्मी सफर का आगाज़*

​टॉम ऑल्टर के अभिनेता बनने की कहानी बेहद दिलचस्प है। जगाधरी में शिक्षण के दौरान उन्होंने थिएटर में राजेश खन्ना और शर्मिला टैगोर की ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘आराधना’ देखी। इस फिल्म ने टॉम के भीतर सोए हुए अभिनेता को जगा दिया। वे राजेश खन्ना के अभिनय से इस कदर प्रभावित हुए कि उन्होंने फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII), पुणे में दाखिला ले लिया। वहाँ उन्होंने अभिनय की बारीकियों को सीखा और वर्ष 1974 में गोल्ड मेडल के साथ पास आउट हुए।

​FTII से निकलने के बाद वर्ष 1976 में निर्देशक चेतन आनंद की फिल्म ‘साहिब बहादुर’ से उनके अभिनय सफर की शुरुआत हुई। हालांकि, उन्हें बड़ी पहचान उसी साल रिलीज़ हुई देव आनंद की फिल्म ‘जानमन’ से मिली।

*​यादगार फिल्में और चरित्र अभिनय का शिखर*

​भारतीय सिनेमा में अक्सर विदेशी दिखने वाले कलाकारों को केवल क्रूर ब्रिटिश अधिकारी या स्मगलर के किरदारों में सीमित कर दिया जाता था, लेकिन टॉम ऑल्टर ने अपनी प्रतिभा के दम पर इस रूढ़िवादिता को तोड़ा। उन्होंने 300 से अधिक फिल्मों में काम किया। उनकी कुछ सबसे महत्वपूर्ण और यादगार भूमिकाएं इस प्रकार हैं:

*​शतरंज के खिलाड़ी* (1977): महान निर्देशक सत्यजीत रे की इस क्लासिक फिल्म में टॉम ऑल्टर ने कैप्टन वेस्टन की भूमिका निभाई थी। जनरल आउटरम (रिचर्ड एटनबरो) के साथ उनके दृश्य और उनकी उर्दू शायरी का शौक फिल्म के सबसे बेहतरीन हिस्सों में से एक है।

*​क्रांति* (1981): मनोज कुमार की इस भव्य फिल्म में उन्होंने एक क्रूर ब्रिटिश अधिकारी की भूमिका को इतने जीवंत तरीके से निभाया कि दर्शक उनसे नफरत करने लगे।

*​परिंदा* (1989): विधु विनोद चोपड़ा की इस कल्ट गैंगस्टर फिल्म में टॉम ने ‘मूसा’ नाम के एक अंडरवर्ल्ड डॉन का किरदार निभाया, जो उनके करियर के सबसे संजीदा किरदारों में गिना जाता है।

*​आशिकी* (1990): महेश भट्ट की इस म्यूजिकल हिट फिल्म में उन्होंने हॉस्टल के सख्त लेकिन दरियादिल वॉर्डन (एशले साहेब) की भूमिका निभाकर युवाओं का दिल जीत लिया।

*​सरदार* (1993): केतन मेहता की इस फिल्म में उन्होंने भारत के अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन की भूमिका को परदे पर जीवंत किया।

*​छोटे परदे के ‘महागुरु’ और रंगमंच से इश्क*

​सिनेमा के साथ-साथ टॉम ऑल्टर टेलीविजन और थिएटर के भी बेताज बादशाह थे। 90 के दशक के बच्चों के लिए वे दूरदर्शन के बेहद लोकप्रिय धारावाहिक ‘शक्तिमान’ के ‘महागुरु’ थे। इसके अलावा उन्होंने ‘जुनून’ (जिसमें उनका किरदार केशव कल्सिया बेहद लोकप्रिय हुआ), ‘ज़बान संभालके’ और ‘भारत एक खोज’ जैसे सीरियल्स में अपनी अमिट छाप छोड़ी।

​थिएटर से उनका लगाव अद्वितीय था। उन्होंने नसीरुद्दीन शाह और बेंजामिन गिलानी के साथ मिलकर ‘मोलीयर एकेडमी’ (माॅटले प्रोडक्शंस) की स्थापना की। वे मंच पर मिर्जा गालिब, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और साहिर लुधियानवी जैसी ऐतिहासिक शख्सियतों के किरदारों को इस कदर जीते थे कि हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठता था।

*​खेल पत्रकारिता और अन्य उपलब्धियां*

​बहुमुखी प्रतिभा के धनी टॉम ऑल्टर एक बेहतरीन लेखक और खेल पत्रकार भी थे। क्रिकेट के प्रति उनका जुनून जगजाहिर था। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि सचिन तेंदुलकर का पहला टीवी इंटरव्यू लेने वाले पत्रकार कोई और नहीं, बल्कि टॉम ऑल्टर ही थे (1989 में)। उन्होंने कई किताबें भी लिखीं।

​कला, सिनेमा और साहित्य में उनके अप्रतिम योगदान के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2008 में उन्हें देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘पद्म श्री’ से नवाजा।

*​कला जगत में अमर विरासत*

​साल 2017 में स्किन कैंसर के कारण 67 वर्ष की आयु में यह महान कलाकार इस दुनिया को अलविदा कह गया। टॉम ऑल्टर भले ही शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन भारतीय कला, रंगमंच और सिनेमा में उनका योगदान हमेशा अमर रहेगा। वे एक ऐसे सच्चे ‘साहिब’ थे, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी कला की साधना और हिंदुस्तानियत को जीने में गुजार दी। उनके जन्मदिन पर उन्हें शत-शत नमन!

■रामानंद सोनी