नई दिल्ली। हिंदू धर्म की पूजा पद्धति में पति और पत्नी को एक साथ बैठकर धार्मिक अनुष्ठान करने की परंपरा रही है। घर में सत्यनारायण कथा हो या कोई शुभ पूजा हवन अथवा धार्मिक आयोजन हो अक्सर पत्नी को पति के बाईं ओर बैठे हुए देखा जाता है। पहली नजर में यह सामान्य परंपरा लग सकती है लेकिन धार्मिक मान्यताओं में इसके पीछे कई प्रतीकात्मक अर्थ बताए गए हैं। पत्नी को पति की अर्धांगिनी और वामांगी कहा जाता है। वामांगी का अर्थ पति के बाएं अंग से जुड़ी स्त्री से लिया जाता है। इसी विचार के कारण गृहस्थ जीवन से जुड़े कई शुभ कार्यों में पत्नी का स्थान पति के बाईं ओर माना गया है।
इस परंपरा को भगवान शिव के अर्धनारीश्वर स्वरूप से भी जोड़ा जाता है। अर्धनारीश्वर की प्रतिमा में शिव और शक्ति को एक ही शरीर के दो हिस्सों के रूप में दर्शाया जाता है। पारंपरिक रूप से इस स्वरूप में स्त्री पक्ष बाईं ओर दिखाई देता है। इसका आध्यात्मिक संदेश यह माना जाता है कि पुरुष और स्त्री अलग होते हुए भी एक दूसरे के पूरक हैं। पति और पत्नी के रिश्ते में भी इसी एकता और संतुलन की भावना को महत्वपूर्ण माना गया है। इसीलिए पूजा में दोनों का साथ बैठना केवल धार्मिक प्रक्रिया नहीं बल्कि दांपत्य साझेदारी का प्रतीक भी माना जाता है।
पत्नी को बाईं ओर स्थान देने के पीछे एक लोकप्रिय सांस्कृतिक व्याख्या हृदय से भी जुड़ी है। मानव शरीर में हृदय बाईं ओर स्थित होता है और इसी कारण बाईं दिशा को प्रेम भावना आत्मीयता और स्नेह से जोड़कर देखा जाता है। धार्मिक और लोक मान्यताओं में पति के बाईं ओर पत्नी का स्थान उसके प्रति निकटता और सम्मान का प्रतीक माना गया है। इसे पति पत्नी के बीच भावनात्मक जुड़ाव और पारिवारिक सामंजस्य की अभिव्यक्ति के तौर पर भी समझा जाता है। यह वैज्ञानिक नियम नहीं बल्कि परंपरा से जुड़ी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक व्याख्या है।
योग और आध्यात्मिक परंपराओं में भी शरीर की ऊर्जा और संतुलन को लेकर कई अवधारणाएं मिलती हैं। कुछ धार्मिक व्याख्याओं में पुरुष और स्त्री ऊर्जा को एक दूसरे का पूरक बताया जाता है। बाईं दिशा को चंद्र या शांत ऊर्जा से और दाईं दिशा को सूर्य या सक्रिय ऊर्जा से जोड़कर देखा जाता है। पति पत्नी के साथ बैठने को इसी संतुलन का प्रतीक माना जाता है। हालांकि ऊर्जा से जुड़े इन विचारों को धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यता के रूप में ही देखना उचित है। इन्हें आधुनिक वैज्ञानिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
यहां एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि हर धार्मिक अनुष्ठान में पत्नी का स्थान हमेशा बाईं ओर ही हो ऐसा जरूरी नहीं है। अलग-अलग परंपराओं और कर्मकांडों में दिशा बदलने की मान्यता भी मिलती है। कुछ स्रोतों के अनुसार सामान्य गृहस्थ और शुभ कार्यों में पत्नी को पति के बाईं ओर बैठाया जाता है जबकि कुछ यज्ञ हवन या विशेष संस्कारों में दाईं ओर बैठने की परंपरा बताई गई है। इसलिए किसी विशेष पूजा या संस्कार के लिए अपने परिवार की परंपरा और संबंधित आचार्य की विधि को प्राथमिकता देना बेहतर माना जाता है। वामांगी की यह अवधारणा अंततः पति पत्नी के रिश्ते में समान भागीदारी का संदेश देती है। पूजा में पत्नी की मौजूदगी यह दर्शाती है कि गृहस्थ जीवन और धार्मिक जिम्मेदारियों में दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण है। यही वजह है कि कई धार्मिक परंपराओं में पत्नी को केवल साथ बैठने वाला व्यक्ति नहीं बल्कि पूजा के संकल्प और अनुष्ठान की सहभागी माना जाता है। इस नजरिए से देखें तो पति के बाईं ओर पत्नी का स्थान केवल बैठने की दिशा नहीं बल्कि प्रेम सम्मान साझेदारी और शिव शक्ति के संतुलन का प्रतीक बन जाता है। यही इस परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक संदेश माना जा सकता है।
