एक पिता अपनी पूरी जिंदगी बच्चों का भविष्य संवारने में लगा देता है। उम्मीद करता है कि बुढ़ापे में बच्चे उसका सहारा बनेंगे, लेकिन पानीपत से सामने आई यह घटना रिश्तों को झकझोर देने वाली है। यहां पांच बेटियां हैं, दामाद हैं और पूरा परिवार है, लेकिन 65 वर्षीय पिता की मौत के बाद अंतिम संस्कार करने के लिए कोई भी पानीपत नहीं पहुंचा। परिवार ने आने में असमर्थता जताई तो जनसेवा दल ने इंसानियत की मिसाल पेश करते हुए पूरे विधि-विधान से अंतिम संस्कार करवाया। इतना ही नहीं, बेटियों को वीडियो कॉल के जरिए पिता के अंतिम दर्शन भी करवाए गए।
दरअसल, मध्यप्रदेश के सिंगरौली निवासी करीब 65 वर्षीय सुशील कुमार सिंह पानीपत के ददलाना गांव में राधा स्वामी कॉलोनी में रहते थे। वह पहले रिफाइनरी में नौकरी करते थे। अचानक सीने में दर्द होने के कारण उनकी मौत हो गई। कॉलोनी के लोगों ने पुलिस को सूचना दी। पुलिस ने शव को सिविल अस्पताल की मोर्चरी में रखवाकर परिजनों को सूचना दी और पोस्टमार्टम के बाद अंतिम संस्कार के लिए पानीपत आने को कहा। लेकिन परिवार की तरफ से जवाब मिला कि वे दूर रहते हैं और पानीपत नहीं आ सकते।
जनसेवा दल के सचिव चमन गुलाटी ने जब परिवार से संपर्क किया तो पता चला कि सुशील कुमार की 5 बेटियां हैं। पत्नी बीमार रहती हैं, तीन बेटियों की शादी हो चुकी है और दो अविवाहित हैं। जनसेवा दल ने बेटियों को आने-जाने का टिकट खर्च देने तक की पेशकश की, लेकिन कोई भी आने को तैयार नहीं हुआ। मामा, चाचा और दामादों से भी संपर्क किया गया, लेकिन वहां से भी निराशा ही हाथ लगी।
आखिरकार परिवार की तरफ से कहा गया कि आप ही अंतिम संस्कार कर दीजिए और हमें वीडियो कॉल पर दिखा दीजिए। इसके बाद जनसेवा दल के सदस्यों ने वीडियो कॉल के माध्यम से बेटियों को उनके पिता का अंतिम संस्कार दिखाया। इस दौरान कुछ बेटियां भावुक भी हुईं। हैरानी की बात यह रही कि अंतिम संस्कार के बाद जब अस्थियां लेने आने के बारे में पूछा गया तो परिवार ने असमर्थता जताते हुए जनसेवा दल से ही हरिद्वार में अस्थियां विसर्जित करने का आग्रह किया।
जनसेवा दल के सचिव चमन गुलाटी ने इस घटना पर दुख जताते हुए कहा कि जिस पिता ने पूरी जिंदगी बच्चों के भविष्य के लिए लगा दी, उसके अंतिम संस्कार के समय परिवार का कोई सदस्य मौजूद नहीं था। उन्होंने समाज से सवाल किया कि क्या रिश्तों से बढ़कर पैसा और दूरी हो गई है? बहरहाल, सुशील कुमार सिंह के अंतिम सफर में उनका परिवार भले ही साथ नहीं था, लेकिन जनसेवा दल के सदस्यों ने उन्हें अकेला नहीं छोड़ा। शन मनचंदा, चमन गुलाटी, कमल गुलाटी, सतीश चुघ, बंटी गांधी, वासुदेव और मदन साइकिल वाले ने पूरे विधि-विधान से उनका अंतिम संस्कार करवाया।
