अपने भावों को संभालना ही सबसे बड़ी तपस्या है: मुनिश्री

ग्वालियर-: अपने भावों को, परिणामों को संभालना ही सबसे बड़ी तपस्या है। जो भव्य जीव हमेशा छह द्रव्य, पांच अस्तिकाय, सात तत्व, नव पदार्थ और बन्ध, मोक्ष के कारण बारह अनुप्रेक्षाओं का एवं रत्नत्रय का चिंतन करना है और देव पूजा आदि दश धर्मो को धारण करता है सो वे सब शुभ भाव है। यह बात राष्ट्रसंत मुनिश्री विहर्ष सागर महाराज ने आज गुरुवार को तानसेन नगर स्थित न्यू कालोनी अजय जैन विजय जैन के निवास पर कोरोना वायरस से मुक्ति दिखने के लिए साधन तपस्या अनुष्ठान कार्यक्रम में व्यक्त किए! मुनिश्री विजयेश सागर महाराज भी मोजूद थे!

मुनिश्री ने कहाकि शुभ कार्य करने से जैसे प्रभु की पूजा ,गुरुओ की सेवा, चार प्रकार के संघ को चार प्रकार का दान देने से, स्वाध्याय करना, संयम का पालन करना, तप करना, सामायिक करना, जाप करना, भक्तामर आदि का पाठ करना, विधान करना और करवाना, तीर्थ वंदना करना, जिन बिम्ब प्रतिष्ठा करवाना और दया धर्म का पालन करता है ऐसे कार्य करने से जो जीव की परिणीति है वे सब शुभ भाव है। देखो भावो से मेढक और कुत्ता एवं सर्प देव पर्याय को प्राप्त हुए। इसलिए अपने भावों को शुभ बनाना चाहिए क्योंकि भावोें को संभालना ही सबसे बड़ी तपस्या है। सबसे बड़ा धर्म है, सबसे बड़ा संयम है।

मुनिश्री ने कहा की अपने भावोें को सुधारो शुभ भाव रूप परिणमन करो क्योकि शुभ भाव ही पुण्य आस्रव का कारण है और अशुभ भाव ही पाप आस्रव का कारण है। शुभ भाव स्वर्ग का कारण है और अशुभ भाव नरकादि गति का कारण है, दुःख का कारण है। इसलिए सदैव शुभ भाव करो और शुभ से शुद्ध भाव तक पहुचने का प्रयास करो यही कल्याण का मार्ग है, मोक्ष का कारण है। 

जैन समाज के प्रवक्ता सचिन जैन ने बताया कि मुनिश्री विहर्ष सागर महाराज 25 से 2 अप्रेल तक साधन, अखण्ड मौन, उपवास एवं अनुष्ठान प्रधानमंत्री के आव्हान कोरोना वायरस मुक्ति दिलाने के लिए तपस्या कर रहे है! आज मुनिश्री के सानिध्य में भक्तामर पाठ किया गया! जिसमें अजय जैन विजय जैन परिवार में भगवान आदिनाथ के समक्ष 48 दीप मुनिश्री ने 48  मंत्रो के साथ समपित किये!

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