ग्वालियर। मध्यप्रदेश के ग्वालियर हाईकोर्ट की युगल पीठ ने अपर सत्र न्यायालय भिण्ड के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें एक विधवा महिला व चार बच्चों की हत्या के आरोप में एक आरोपी अंकुर दीक्षित को फांसी की सजा सुनाई थी। न्यायालय ने आरोपी को दोषमुक्त करते हुए कहा कि हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं, कि अभियोजन घटना को प्रमाणित करने में नाकाम रहे है। घटना दिनांक को आरोपी मृतकों के साथ देखा नहीं गया था। मामला पूरा संदेहहास्पद है। अंकुर दीक्षित को बाइज्जत बरी कर दिया।

भिण्ड शहर के वीरेंद्र नगर में स्वर्गीय शिक्षक शशिकांत शुक्ला की पत्नी रीना शुक्ला (40वर्ष) बेटी छवि (12वर्ष), गढा गांव निवासी जेठ वेदप्रकाश शुक्ला की बेटी महिमा (17वर्ष) के साथ रहती थी। पास में मायका था। मायके से भाई बृजमोहन शर्मा की बेटी अंबिका (15वर्ष) सोने आती थी। गजना गांव निवासी ममेरे ससुर रामकुमार शर्मा का बेटा अवनीश शर्मा (15वर्ष) पढने के लिए श्रीमती शुक्ला के घर रह रहा था। 14 मई 2016 दिन शनिवार सुबह श्रीमती शुक्ला के घर हलचल नहीं दिखी तो उनकी मां सियाबेटी ने नाती बेटू (10वर्ष) को रिश्तेदार के घर से श्रीमती शुक्ला की छत पर भेजा था।

बेटू ने खिडकी में सरिया डालकर जीने का गेट खोला और घर में गया था। एक कमरे में रीना, छवि, महिमा और अंबिका के शव पडे थे। किचन में अवनीश शर्मा का शव था। बेटू ने बाबा श्रीराम शर्मा को लाशों के बारे में बताया था। मृतिका श्रीमती शुक्ला के मोबाइल कॉल डिटेल से पुलिस आरोपी अंकुर दीिक्षत तक पहुंची थी। आरोपी ने पुलिस को बयान दिया था श्रीमती शुक्ला से उसके संबंध थे। वारदात वाली रात वह मिलने गया था। यहां अवनीश ने उन दोनों को देख लिया था। भेद खुलता देख किचन में ले जाकर अवनीश के हाथ-पैर बांधकर सब्जी काटने के चाकू से गला रेत दिया था। इसके बाद से महिमा, अंबिका और छवि की गला रेतकर हत्या कर दी थी। हत्याकांड का पर्दाफाश न हो इसके लिए आखिरी में श्रीमती शुक्ला की गला रेतकर हत्या कर दी थी। हत्या के बाद आरोपी घर के मुख्य द्वार पर बाहर से ताला डालकर चला गया था।

पुलिस ने मामले की जांच कर अंकुर दीक्षित के खिलाफ चालान पेश किया। द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश एमएल राठौर ने अंकुर दीक्षित को फांसी की सजा सुनाई थी। फांसी की सजा कन्फर्म होने के लिए मामला हाईकोर्ट आ गया। हाईकोर्ट ने मामले पर कल फाइनल सुनवाई की। अभियोजन ने कहीं भी साबित नहीं कराया कि घटना दिनांक को अंकुर को मृतकों के साथ देखा गया था। पूरा मामला संदिग्ध हो गया। उसका लाभ आरोपी को मिला। हाईकोर्ट ने आरोपी को दोषमुक्त कर दिया।

पुलिस अनुसंधान में कई कमियां रहने के कारण फांसी की सजा से दण्डित आरोपी सजा से बच गया। अंकुर दीक्षित ने हत्या की या नहीं लेकिन इतना बडा जघन्य हत्याओं के बाद पुलिस के अनुसंधान पर प्रश्न चिन्ह जरुर लग जाता है।

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